Jagannath ji puri

इतिहास दबाया गया: जगन्नाथ मंदिर का शौर्य!

पुरी के पावन मंदिर पर 18 बार आक्रमण: एक अटूट आस्था और शौर्य गाथा

अठारह बार तलवारें चलीं, बहा लहू,पर पावन धाम की आत्मा झुकी नहीं.

हर मुगलिया वार खाली गया, झूठा हुआ, हिंदू आस्था की ज्योति कभी बुझी नहीं.” (Part 5)

इतिहास दबा था, अब खुलेंगे राज सारे,
क्रूरता का कैसा था वो भयानक प्रहार!
पर संस्कृति ने हर दंश को झेला है,
विजयी हुई है हमारी सनातन धार.

कल्पना कीजिए एक ऐसे पावन धाम की, जिस पर एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे 18 बार तलवारें चलीं, खून बहाया गया, और उसे ध्वस्त करने का हर संभव प्रयास किया गया। यह सिर्फ एक इमारत का इतिहास नहीं, बल्कि भारत की उस अदम्य आत्मा की गाथा है, जो क्रूरता और विध्वंस के सामने कभी नहीं झुकी। यह उन मुगल सम्राटों की घिनौनी करतूतों का कड़वा सच है, जिन्हें आज तक हिंदू समाज से छिपाया गया है। यह वह काला अध्याय है, जिसमें मंदिरों को तोड़ने, भगवान की भव्य मूर्तियों को खंडित करने और हमारी सनातन हिंदू संस्कृति को जड़ से मिटाने के लिए कई भयानक प्रयास किए गए।

यह कहानी है भारत के उस दिव्य और भव्य मंदिर की, जिसे मिटाने के लिए अनगिनत आक्रमणकारी आए, कई शासकों ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। कई मुस्लिम राजाओं और मुगल सम्राटों ने अपनी पूरी उम्र इस एक लक्ष्य को समर्पित कर दी, और लाखों योद्धाओं, सैनिकों और बाहुबलियों ने अपना रक्त बहाया, लेकिन यह मंदिर फिर भी नहीं टूटा!

यह उस हिंदू मंदिर की दर्द भरी हकीकत है, जहाँ लुटेरों ने हिंदुओं को डराने, भगवान की मूर्तियों को तोड़ने, मंदिर के सोने-चांदी को लूटने और सनातन धर्म की आस्था को बर्बाद करने के लिए खून की नदियां बहा दीं। यह उस मंदिर की घटना है, जिसे सिर्फ इसलिए मिटाया जा रहा था, क्योंकि मुगलों को लगा कि इस मंदिर को तोड़कर वे हिंदू आस्था को खत्म कर देंगे। लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि यह मंदिर सिर्फ पत्थरों से नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था से बना है, जिसे वे 18 बार हमला करके भी नहीं तोड़ पाए।

यह कहानी है उन 18 हमलों की, जिनमें लाखों लोगों ने अपनी आस्था और संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह हिंदुओं के उस मंदिर की कहानी है, जिसे बचाने के लिए खुद भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्तों का साथ दिया। यह उस सच्चे इतिहास की बात है, जिसके बारे में किसी ने भी आपको कभी नहीं बताया, क्योंकि अगर इस मंदिर पर 18 बार हुए आक्रमणों का इतिहास आपको पता चलता, तो शायद आपकी आंखें खुल जातीं। इसलिए इसे दबाया गया, क्योंकि यह इतिहास है हिंदू संस्कृति के संघर्ष और विजय का। लेकिन आज हम आपको उस काले इतिहास के बारे में बताएंगे, जिसके बारे में आज तक आपने न कभी सुना होगा और न ही पढ़ा होगा।

तो चलिए, जानते हैं उस डरावने इतिहास के बारे में,

छिपाए गए विग्रह, बचाई गई पूजा,
चिल्का की लहरें बनीं रक्षक हमारी.
काला पहाड़ की क्रूरता भी फीकी पड़ी,
बच गई जगन्नाथ की महिमा न्यारी.

 मंदिर के अभिलेखों के अनुसार, जिसे मादल पांजी कहा जाता है, इस मंदिर पर 18 बार आक्रमण और लूटपाट की गई है। ये आक्रमणकारी मुख्य रूप से मंदिर की अपार संपत्ति को लूटने और हिंदू आस्था के प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से आते थे।

यहाँ जगन्नाथ मंदिर पर हुए कुछ प्रमुख हमलों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

पहला आक्रमण: रक्ताबाहु का हमला (9वीं शताब्दी)

मंदिर पर पहला recorded आक्रमण 9वीं शताब्दी ईस्वी में राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय (जिसे रक्ताबाहु भी कहा जाता है) द्वारा किया गया था। इस आक्रमण के दौरान, मंदिर के पुजारी और सेवक देवताओं की मूर्तियों को बचाने में सफल रहे, उन्हें गुप्त रूप से पुरी से दूर सोनेपुर के पास गोपाली नामक स्थान पर छिपा दिया गया। यह चाल मूर्तियों को लगभग 146 वर्षों तक हमलावरों से सुरक्षित रखने में सहायक रही, जब तक कि राजा ययाति प्रथम ने उन्हें वापस लाकर पुनः प्रतिष्ठित नहीं किया। इस शुरुआती हमले ने भविष्य के हमलों के लिए एक पैटर्न स्थापित किया, जहाँ देवताओं को बचाने के लिए उन्हें गुप्त स्थानों पर ले जाया जाता था।

दूसरा आक्रमण: इलियास शाह का हमला (1340 ई.)

1340 ईस्वी में, बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने उत्कल (ओडिशा) पर हमला किया, जो उस समय राजा नरसिंहदेव तृतीय के अधीन था। इलियास शाह का उद्देश्य केवल धन लूटना नहीं था, बल्कि हिंदू आस्था के इस पवित्र प्रतीक को ध्वस्त करना भी था। राजा नरसिंहदेव तृतीय को आक्रमण की जानकारी पहले ही मिल गई थी। उन्होंने बुद्धिमानी से मूर्तियों को बचाने का निर्णय लिया। पुजारियों ने रात के अंधेरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को मंदिर से बाहर निकाला और उन्हें जंगल में एक गुप्त गुफा में छिपा दिया। इलियास शाह की सेना ने मंदिर को लूटा और क्षतिग्रस्त कर दिया, लेकिन उन्हें मुख्य मूर्तियाँ नहीं मिलीं। इस प्रकार, भक्तों की आस्था और राजा की दूरदर्शिता के कारण देवता सुरक्षित रहे।

तीसरा आक्रमण: फिरोज शाह तुगलक का हमला (1360 ई.)

पहले हमले के लगभग 20 साल बाद, 1360 ईस्वी में, दिल्ली के मुस्लिम शासक फिरोज शाह तुगलक ने जगन्नाथ मंदिर पर आक्रमण किया। यह गंगा वंश के राजा भानुदेव तृतीय के शासनकाल में हुआ था। राजा को आक्रमण की खबर मिलते ही, उन्होंने मूर्तियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की व्यवस्था की। फिरोज शाह की सेना ने मंदिर को भारी नुकसान पहुँचाया और संपत्ति लूटी, लेकिन मूर्तियों को नष्ट करने में सफल नहीं हो सके, क्योंकि वे पहले ही छिपा दी गई थीं। कुछ ऐतिहासिक खातों में यह भी कहा गया है कि फिरोज शाह ने मूर्तियों को समुद्र में फेंकने का प्रयास किया था, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

चौथा आक्रमण: इस्माइल गाजी का हमला (1509 ई.)

1509 ईस्वी में, बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के कमांडर इस्माइल गाजी ने जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया। इस समय ओडिशा पर सूर्यवंशी राजा प्रताप रुद्रदेव का शासन था। राजा प्रताप रुद्रदेव ने आक्रमण का पूर्वानुमान लगाते हुए पुजारियों को मूर्तियों को चिल्का झील के पास चांदई गुहा पहाड़ा नामक एक निर्जन द्वीप पर छिपाने का आदेश दिया। इस्माइल गाजी ने मंदिर को लूटा और अपवित्र किया, लेकिन मूर्तियों को ढूंढने में असफल रहा। लौटने पर, राजा प्रताप रुद्रदेव ने हुगली के पास इस्माइल गाजी की सेना को घेर लिया और उन्हें बुरी तरह हराया, जो मुस्लिम आक्रमणकारियों पर हिंदुओं की एक महत्वपूर्ण जीत थी।

पाँचवाँ आक्रमण: काला पहाड़ का विध्वंस (1568 ई.)

1568 ईस्वी जगन्नाथ मंदिर के इतिहास में एक काला दिन था, जब अफगान सुल्तान सुलेमान कर्रानी के सेनापति काला पहाड़ ने सबसे भीषण हमलों में से एक का नेतृत्व किया। काला पहाड़ अपनी क्रूरता और विध्वंसक कृत्यों के लिए कुख्यात था। इस आक्रमण के दौरान, मुख्य मूर्तियों को फिर से चिल्का झील में एक द्वीप पर छिपा दिया गया। हालांकि, काला पहाड़ ने कुछ छोटी मूर्तियों और प्रतीकों को ढूंढ निकाला, उन्हें आग लगा दी और मंदिर को भारी नुकसान पहुँचाया। उसने मंदिर के कुछ हिस्सों को ध्वस्त कर दिया, लेकिन भक्तों की सूझबूझ और बलिदान ने मुख्य देवताओं को बचा लिया।

छठवां आक्रमण: उस्मान और सुलेमान का हमला (1592 ई.)

1592 ईस्वी में, ईशा के बेटे उस्मान और कुतुब खान के बेटे सुलेमान ने मिलकर जगन्नाथ मंदिर पर एक और क्रूर हमला किया। उन्होंने मंदिर में बड़े पैमाने पर लूटपाट और विनाश किया। मंदिर परिसर में रक्तपात हुआ और निर्दोष भक्तों को निशाना बनाया गया। मूर्तियों को अपवित्र किया गया और कुछ को तोड़ भी दिया गया। यह आक्रमण ओडिशा की संस्कृति और आस्था पर एक गहरा आघात था।

सातवां आक्रमण: मिर्जा खुर्रम का हमला (1601 ई.)

1601 ईस्वी में, बंगाल के नवाब इस्लाम खान के कमांडर मिर्जा खुर्रम ने जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया। इस बार भी, मंदिर के पुजारियों ने अद्भुत साहस और सूझबूझ का प्रदर्शन किया। उन्होंने मूर्तियों को गुप्त रूप से मंदिर से निकालकर भार्गवी नदी के रास्ते पुरी से दूर ले गए। मूर्तियों को पहले कपिलेश्वर गाँव में छिपाया गया, और फिर जासूसों से बचने के लिए उन्हें लगातार अलग-अलग सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया, जैसे कि गुफाओं और घने जंगलों में। मिर्जा खुर्रम ने मंदिर को लूटा और क्षतिग्रस्त कर दिया, लेकिन वह देवताओं की मुख्य मूर्तियों को प्राप्त नहीं कर सका।

अन्य प्रमुख आक्रमण:

जगन्नाथ मंदिर पर इसके बाद भी कई आक्रमण हुए, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:

 * आठवां आक्रमण (1608 ई.): ओडिशा के सूबेदार हासिम खान ने हमला किया। मूर्तियों को खुर्दा के गोपाल मंदिर में ले जाया गया।

 * नौवां आक्रमण (1610 ई.): हिंदू राजपूत जागीरदार केशोदास्मरु, जो हासिम खान के अधीन थे, उन्होंने मंदिर पर हमला किया।

 * दसवां और ग्यारहवां आक्रमण (1611, 1612 ई.): अकबर के राजस्व मंत्री राजा टोडर मल के बेटे कल्याण मल्ल ने दो बार हमला किया।

 * बारहवां आक्रमण (1617 ई.): ओडिशा के गवर्नर मुकर्रम खान ने हमला किया, जिसके दौरान मूर्तियों को गोपापदर और फिर बांकानिधि मंदिर में छिपाया गया।

 * तेरहवां आक्रमण (1621 ई.): मुगल महारानी नूरजहाँ के भतीजे मिर्जा अहमद बेग ने हमला किया।

 * चौदहवां आक्रमण (1645 ई.): ओडिशा के गवर्नर अमीर मुताकंद खान ने हमला किया।

 * पंद्रहवां आक्रमण (1647 ई.): अमीर फतेह खान ने हमला किया।

 * सोलहवां आक्रमण (1692 ई.): मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ओडिशा के नवाब एकराम खान ने हमला किया। इस दौरान मूर्तियों को बिमला मंदिर के पीछे छिपा दिया गया था।

 * सत्रहवां और अठारहवां आक्रमण (1731, 1733 ई.): ओडिशा के नायब नाजिम मुहम्मद ताकि खान ने दो बार मंदिर पर हमला किया। आखिरी आक्रमण के दौरान, सेवकों ने मूर्तियों को मारदा (गंजम जिले) में छिपा दिया, जहाँ वे तीन साल तक रहीं।

मंदिर का लचीलापन और भक्तों की आस्था

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन सभी आक्रमणों के बावजूद, जगन्नाथ मंदिर और उसके देवताओं की मुख्य “ब्रह्म पदार्थ” (भगवान कृष्ण का हृदय माना जाता है) को कभी नष्ट नहीं किया जा सका। पुजारियों और भक्तों की असाधारण निष्ठा और सूझबूझ ने हर बार देवताओं को सुरक्षित स्थानों पर छिपाकर रखा।

जगन्नाथ मंदिर पर बार-बार हुए हमलों ने भी एक नियम को जन्म दिया: गैर-हिंदुओं को मंदिर के अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं है। यह नियम शायद अतीत में हुए हमलों और अपवित्रीकरण के अनुभवों के कारण लागू किया गया था ताकि मंदिर की पवित्रता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

यह इतिहास केवल विनाश का नहीं, बल्कि अडिग आस्था, अदम्य साहस और सनातन धर्म के लचीलेपन का प्रतीक है। जगन्नाथ मंदिर उन सभी बाधाओं से ऊपर उठकर खड़ा है, जो उस पर थोपी गईं, और आज भी करोड़ों भक्तों के लिए आशा और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।

जय जगन्नाथ जी

कहानी जारी है …to be continued …

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