पुरुषोत्तम महीना (अधिक मास): जब समय को भी ईश्वर की शरण में जाना पड़ा
समय केवल घड़ी की सुइयों में नहीं चलता कभी-कभी समय स्वयं भी ठहरकर ईश्वर की ओर देखता है। सनातन परंपरा में ऐसा ही एक अद्भुत काल आता है। पुरुषोत्तम महीना जिसे अधिक मास भी कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र मास 17 मई से 15 जून तक रहेगा ।
यह कोई साधारण महीना नहीं यह वह समय है जब भक्ति केवल कर्म नहीं रहती, बल्कि आत्मा और ईश्वर के बीच का मौन संवाद बन जाती है।
पुरुषोत्तम नाम की कथा: उपेक्षित समय का सम्मान
“पुरुषोत्तम” भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का एक दिव्य नाम है, जिसका अर्थ है,
“सर्वश्रेष्ठ पुरुष” या “श्रेष्ठतम ईश्वर।”
पुराणों में एक अत्यंत भावपूर्ण कथा मिलती है। कहा जाता है कि एक अतिरिक्त महीना था, जिसे कोई महत्व नहीं देता था। न उसमें विवाह होते, न उत्सव, न ही लोग उसे शुभ मानते।
उस उपेक्षा से दुखी होकर वह मास देवताओं के पास गया, पर कहीं सम्मान न मिला। अंततः वह भगवान विष्णु की शरण में पहुँचा। उसने करुण स्वर में कहा –
“प्रभु… मैं समय का हिस्सा होकर भी तिरस्कृत हूँ। कोई मुझे अपना नहीं मानता।”
भगवान विष्णु उसकी वेदना से द्रवित हो उठे। उन्होंने उसे अपने हृदय से लगाया और कहा
“आज से तुम उपेक्षित नहीं रहोगे। मैं तुम्हें अपना नाम देता हूँ–पुरुषोत्तम। जो तुम्हारा सम्मान करेगा, वह मेरा सम्मान करेगा।”
तभी से अधिकमास पुरुषोत्तम मास कहलाया । एक ऐसा महीना जिसे स्वयं भगवान का आश्रय प्राप्त हुआ।
वैज्ञानिक और ज्योतिषीय रहस्य– समय का संतुलन
इस मास की सुंदरता केवल आस्था में ही नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान में भी छिपी है। हमारा वैदिक पंचांग मुख्यतः चंद्रमा की गति पर आधारित है, जबकि ऋतुएँ और मौसम सूर्य की गति से निर्धारित होते हैं। इन दोनों की गणना में हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर उत्पन्न हो जाता है। धीरे-धीरे यह अंतर बढ़ता है और लगभग तीन वर्षों में करीब 30 दिन हो जाता है।
यदि इसे संतुलित न किया जाए तो ऋतुएँ और पर्व अपने वास्तविक समय से हटने लगें।
इसी असंतुलन को ठीक करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है यही है अधिक मास। अर्थात-यह महीना केवल धार्मिक विश्वास नहीं,
बल्कि समय और प्रकृति के बीच संतुलन का अद्भुत विज्ञान भी है।
धार्मिक महत्व– भक्ति का स्वर्णिम काल
शास्त्रों में पुरुषोत्तम मास को अत्यंत पुण्यदायी कहा गया है। मान्यता है कि इस काल में किए गए जप, तप, दान और सेवा का फल सामान्य समय की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। यह कोई चमत्कार की व्यापारिक कल्पना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संकेत है, कि जब मनुष्य कुछ समय सांसारिक दौड़ से हटकर आत्मा की ओर लौटता है, तब उसका अंतर्मन अधिक निर्मल और ग्रहणशील हो जाता है। भगवान विष्णु से जुड़ा यह मास हमें याद दिलाता है कि-
ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं मिलते,
वे हमारे संयम, करुणा और निस्वार्थ कर्म में भी प्रकट होते हैं।
इस मास में क्या करें?
पुरुषोत्तम मास को साधना और आत्मचिंतन का काल माना गया है। प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की आराधना शुभ मानी जाती है। पीले वस्त्र धारण करना, तुलसी पत्र अर्पित करना और मंत्र, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप विशेष रूप से किया जाता है। कई श्रद्धालु पूरे महीने-
- श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ,
- विष्णु सहस्रनाम का जप,
- भागवत कथा का श्रवण,
- व्रत, दान और सेवा
नियमित रूप से करते हैं। नदी स्नान और पूजा-अर्चना को भी आत्मशुद्धि का माध्यम माना गया है। किन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है-
भक्ति केवल कर्मकांड नहीं…
मन की सच्चाई भी होनी चाहिए।
क्या वर्जित माना गया है?
परंपरानुसार इस पूरे मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। इसके पीछे विचार यह है कि यह समय बाहरी उत्सवों से अधिक आंतरिक साधना के लिए रखा जाए। सात्विक भोजन, संयम और आत्मनियंत्रण पर विशेष बल दिया जाता है। तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहना और मन-वचन-कर्म की शुद्धि का प्रयास करना इस मास की भावना मानी गई है।
पुरुषोत्तम मास का वास्तविक संदेश
अधिक मास हमें एक गहरी सीख देता है। जिसे संसार ने “अधिक” कहकर अलग कर दिया भगवान ने उसे “पुरुषोत्तम” कहकर सम्मान दिया। यह कथा केवल एक महीने की नहीं उन हर लोगों की भी है जो कभी उपेक्षित, अस्वीकार या अकेले महसूस करते हैं। ईश्वर का संदेश स्पष्ट है-
जिसे संसार तुच्छ समझे,
संभव है वही ईश्वर के सबसे निकट हो।
इसलिए पुरुषोत्तम मास केवल पंचांग का अतिरिक्त समय नहीं, बल्कि आत्मा को पुनः अपने भीतर लौटाने का निमंत्रण है- एक ऐसा काल जब मनुष्य स्वयं से पूछ सके,
“मैं केवल जीवन जी रहा हूँ…
या सच में अपने भीतर के ईश्वर को भी सुन रहा हूँ?”
By -Aruna Shaibya
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