आत्मिक शांति की पुकार!
जब बचपन की धूप थी, तो छाँव भी साथ चलती थी,
हर दुख को माँ की ममता चुपचाप निगलती थी।
अब तो बस दौड़ है, मंज़िल कहीं नज़र नहीं,
हर रिश्ता पीछे छूटा, बस आगे की फ़िकर रही।कभी हँसी की वजह थी जो, अब वो चुप्पियाँ बन गईं,
दिल की बातें कहने वाली आँखें भी अनजानी बन गईं।
जिस दौलत को पा लेने की ख्वाहिश पलकों में थी,
उसी ने आज रूह की तन्हाई की चादर ओढ़ा दी।ये जो सफलता की चमक है, अंदर के अंधेरों को छुपाती है,
पर एक दिन यही ख़ामोशी, आत्मा तक को डुबो जाती है।
मत भूलो उस बचपन की सच्ची, निश्छल मुस्कान को,
जो दो पल की मौन खुशी से जीवन को बेमिसाल बनाती है।चलो फिर से रिश्तों को समय देना सीखें,
खुद से मिलना, मुस्कुराना, और जीना सीखें।
क्योंकि जीवन की असली सफलता वही कहलाती है,
जहाँ मन शांत हो, और आत्मा मुस्कराती है।
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारी समझ का दायरा बढ़ता जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमें कई तरह से लाभ पहुँचाता है, पर इसकी एक भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है। बचपन का वो बेफिक्र सुकून, वो निश्चिंतता कहीं गहरे दफन हो जाती है, और हमें इसका एहसास अक्सर बहुत देर से होता है।
वो दिन, जब सूरज की हर किरण एक नई कहानी कहती थी, और छोटी सी चोट भी माँ की एक पुचकार से ठीक हो जाती थी – वो सब एक धुंधली याद बन कर रह जाता है।जीवन की इस आपाधापी में, हम लगातार भागते चले जाते हैं।और इस भागती दुनिया के साथ बिखरते रिश्ते मिलते हैं ।
हमारी नज़रें बस पैसा और सफलता पर टिकी रहती हैं। इन दोनों को पाने की होड़ में हम क्या-क्या खो रहे हैं, इसकी कीमत का हम कभी हिसाब ही नहीं लगाते। हम भूल जाते हैं कि कभी हमें दोस्तों के साथ घंटों खेलना, या परिवार के साथ एक शांत शाम बिताना ही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत लगता था। आज, उस दौलत के पीछे भागते हुए हम अपनी आत्मा की शांति ही खो देते हैं।कभी-कभी, इसी भाग-दौड़ के बीच एक गहरा झटका लगता है। कोई अप्रिय घटना, कोई बड़ा नुकसान, या बस एक पल की खालीपन हमें भीतर तक हिला देता है। तब हमें बचपन का वो निश्छल प्यार और सुकून याद आता है।
तभी हमें एहसास होता है कि हम तो उसे बहुत पहले ही कहीं पीछे छोड़ आए थे – उस मोड़ पर, जहाँ हमने जिंदगी की भाग-दौड़ को ही अपना सब कुछ मान लिया था।फिर क्या, यहीं से अवसाद की दुनिया शुरू होती है, निराशा और हताशा का अंधकार हमें घेरने लगता है। इस दुनिया के रिश्तेदार हैं – असहनीय दर्द, अनचाही बीमारियाँ, और एक अंतहीन थकान।
ये सभी हमें अंदर से खोखला करते जाते हैं। हम महसूस करते हैं कि जिस चमक-दमक के पीछे हम भागे थे, उसने हमें भीतर से पूरी तरह खाली कर दिया है। और कभी-कभी यह इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति आत्मघाती कदम तक उठा लेता है – एक ऐसा कदम जो जीवन के प्रति हमारी अनमोल भेंट को ही मिटा देता है।ईश्वर ने हमें यह अनमोल जीवन इसलिए नहीं दिया है कि हम इसे इस तरह दुखद अंत दें।
बेशक, सफल बनिए, आगे बढ़िए, लेकिन अहंकार की चादर कभी अपने ऊपर मत ओढ़िए। यह चादर, जो शुरुआत में भले ही बहुत सुखद लगे, आपको केवल और केवल अकेलापन देगी। यह आपको अपनों से दूर कर देगी, और एक दिन आप खुद को एक विशाल, खाली कमरे में अकेला पाएंगे, जहाँ केवल आपकी उपलब्धियों की गूँज होगी, रिश्तों की नहीं।इसलिए, अपने जीवन के हर कदम को सोच-विचार कर आगे बढ़ाएँ।
यह जिंदगी अनमोल है, हमें यह सिर्फ एक बार मिलती है। इसे प्यार से जिएँ, हर पल को महसूस करें, छोटी-छोटी खुशियों को सहेजें। अपनों के साथ वक्त बिताएं, उनकी मुस्कान में अपनी खुशी ढूंढें। दूसरों को भी उसी प्यार और सम्मान से जीने दें, क्योंकि जीवन एक प्रतिध्वनि है; आप जो देते हैं, वही लौटकर आता है। असली सफलता वह नहीं जो बैंक बैलेंस से मापी जाए, बल्कि वह है जो मन की शांति और रिश्तों की गहराई से परिभाषित हो।
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