Pilgrims circumambulating the sacred Manikarnika Kund during the Panchkoshi Yatra pilgrimage in Varanasi.

काशी पंचक्रोशी यात्रा मणिकर्णिका से क्यों शुरू होती है और कालभैरव की अनुमति क्यों ली जाती है

भाग 1  मणिकर्णिका से विश्वनाथ तक: पंचक्रोशी संकल्प का दिव्य आरंभ– 

काशी की पंचक्रोशी यात्रा लगभग 25 कोस / 88 किमी की पवित्र परिक्रमा मानी जाती है, जिसमें 108 देवस्थल जुड़े बताए जाते हैं। इसके पाँच मुख्य पड़ाव हैं-कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर और कपिलधारा। 

1. मणिकर्णिका कुंड – जहाँ संकल्प जन्म लेता है 

यात्रा का प्रथम स्पर्श मणिकर्णिका से होता है। यह केवल घाट नहीं, काशी का वह रहस्य है जहाँ जीवन और मृत्यु एक ही ज्योति में मिलते हैं। यात्री यहाँ स्नान या आचमन कर संकल्प लेता है- 

“मैं काशी-मंडल की परिक्रमा करूँगा, 
अपने शरीर, मन, प्राण, बुद्धि और आत्मा को शिव के चरणों में समर्पित करूँगा।” 

मणिकर्णिका में संकल्प लेना इस बात का प्रतीक है कि यात्रा अहंकार से नहीं, विनम्रता से प्रारंभ होती है। 

2. ज्ञानवापी / ज्ञानकूप – काशी का मौन ज्ञान 

मणिकर्णिका के बाद साधक ज्ञानवापी का स्मरण करता है। 
“ज्ञानवापी” का अर्थ है ज्ञान का कुआँ। यह स्थल बताता है कि काशी केवल मृत्यु-मोक्ष की भूमि नहीं, बल्कि ज्ञान की भूमि भी है। 
यहाँ यात्री भीतर से प्रार्थना करता है- 

“हे महादेव, मुझे केवल दर्शन नहीं, दृष्टि दीजिए।” 

3. काशी विश्वनाथ – यात्रा की अनुमति 

इसके बाद साधक बाबा विश्वनाथ के दर्शन करता है। क्योंकि पंचक्रोशी यात्रा काशी की परिक्रमा है, और काशी के अधिपति स्वयं विश्वनाथ हैं। यहाँ यात्री बिल्वपत्र, जल, पुष्प अर्पित कर कहता है- 

“नाथ, आपकी नगरी की परिक्रमा का साहस कर रहा हूँ। मेरे पग आपके हों, मेरी थकान आपकी हो, और यह यात्रा मेरे भीतर के अंधकार को दूर करे।” 

पंचक्रोशी यात्रा परंपरा में काशी खंड से जुड़ी मानी जाती है और इसे विश्वनाथ-मंडल की परिक्रमा के रूप में देखा जाता है। 

4. अन्नपूर्णा देवी – यात्रा की करुणा 

विश्वनाथ के बाद माँ अन्नपूर्णा का स्मरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। क्योंकि पंचक्रोशी यात्रा में शरीर चलता है, भूख लगती है, थकान आती है और माँ अन्नपूर्णा वह शक्ति हैं जो साधक को पोषण देती हैं। 

यहाँ साधक प्रार्थना करता है- 

“माँ, मेरे भीतर केवल अन्न की भूख न रहे, धर्म, करुणा और शांति की भूख भी जागे।” 

5. ढुंढिराज गणेश – विघ्नों का निवारण 

काशी में यात्रा प्रारंभ करने से पहले गणेश-वंदना का विशेष महत्व है। ढुंढिराज गणेश को काशी के मंगलकर्ता रूप में माना जाता है। यहाँ यात्री कहता है- 

“हे विनायक, मार्ग लंबा है, शरीर सीमित है, मन चंचल है आप मेरे पगों से पहले चलिए।” 

6. कालभैरव – काशी के कोतवाल की अनुमति 

काशी में कोई भी आध्यात्मिक यात्रा कालभैरव के स्मरण के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती। 
वे काशी के रक्षक, दंडनायक और मर्यादा के देवता हैं। 

पंचक्रोशी यात्रा में कालभैरव का भाव यह है- 

शिव तक पहुँचने के लिए केवल भक्ति नहीं, अनुशासन भी चाहिए। 

यात्री यहाँ प्रार्थना करता है- 

“भैरव बाबा, मेरे भीतर के भय, आलस्य, अहंकार और भ्रम को दंड दीजिए। मुझे मार्ग से विचलित न होने दीजिए।” 

7. अंतःकाशी से बाह्य काशी की ओर 

जब साधक मणिकर्णिका, विश्वनाथ, अन्नपूर्णा, गणेश और कालभैरव का स्मरण कर आगे बढ़ता है, तब वह केवल शहर से बाहर नहीं निकलता  वह अपने भीतर के पहले आवरण से बाहर निकलना प्रारंभ करता है। 

यहीं पंचक्रोशी यात्रा का गूढ़ अर्थ खुलता है- 

मणिकर्णिका — मृत्यु का स्मरण 
विश्वनाथ — ईश्वर का आश्रय 
अन्नपूर्णा — जीवन का पोषण 
गणेश — आरंभ का मंगल 
कालभैरव — मार्ग का अनुशासन 

और फिर पहला पड़ाव आता है 

कर्दमेश्वर महादेव पंचक्रोशी का प्रथम द्वार 

To be continued . . .

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