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“पैर बाहर चलते हैं, लेकिन यात्रा भीतर होती है…” काशी पंचकोशी यात्रा का अद्भुत रहस्य

पुरुषोत्तम मास में केवल व्रत और पूजा ही नहीं, बल्कि पंचकोश यात्रा और पंचकोशी/परिक्रमा यात्राओं का भी विशेष महत्व माना गया है विशेषकर काशी में। यहाँ एक सुंदर बात समझनी चाहिए पंचकोश” (आंतरिक पाँच आवरण) और पंचकोशी यात्रा” (पवित्र भू-परिक्रमा)  दोनों अलग होते हुए भी एक-दूसरे के प्रतीक हैं। 

काशी में यह संबंध अत्यंत गहरा माना गया है। 

1. काशी की पंचकोशी (पंचक्रोशी) यात्रा बाहरी मार्गभीतर की साधना 

काशी की प्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा लगभग 80-90 किमी की परिक्रमा मानी जाती है, जिसका उल्लेख  स्कंदपुराण के काशी खंड  में मिलता है। यह यात्रा पुरुषोत्तम मास में भी विशेष पुण्यकारी मानी जाती है। परंपरानुसार इसका संकल्प प्रायः मणिकर्णिका क्षेत्र से लेकर पाँच प्रमुख पड़ावों के माध्यम से पूर्ण किया जाता है। काशी के पवित्र मंडल और पंचक्रोशी परिक्रमा को केवल भूगोल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मंडल माना गया है। 

काशी की पंचकोशी यात्रा केवल पैरों से नहीं होतीवह मनुष्य के पाँच कोशों की यात्रा भी है। 

पंचकोशी यात्रा और पंचकोश प्रतीकात्मक संबंध 

पहला चरण – अन्नमय कोश 

यात्रा प्रारंभ। 

जब साधक घर की सुविधा छोड़ता है, पैदल चलता है, धूल सहता है, व्रत रखता है, तब सबसे पहले शरीर का अहं टूटता है। यह अन्नमय कोश की साधना है। 

दूसरा चरण – प्राणमय कोश 

मार्ग कठिन होता है। थकान, पसीना, श्वास, मंत्र, “हर हर महादेव” का उच्चारण—यहीं प्राण का शोधन प्रारंभ होता है। मानो श्वास स्वयं जप बन जाए। 

तीसरा चरण – मनोमय कोश 

यात्रा के मध्य मन विद्रोह करता है, “क्यों चल रहे हो? क्या मिलेगा?” यहीं वास्तविक तप है। काशी की यात्रा मन के शोर को सामने लाती है। 

चौथा चरण – विज्ञानमय कोश 

धीरे-धीरे भीतर मौन उतरता है। साधक समझने लगता है, मैं केवल दर्शक नहीं मैं स्वयं यात्रा हूँ। यह विवेक का उदय है। 

पाँचवाँ चरण – आनंदमय कोश 

जब परिक्रमा पूर्ण होती है साधक केवल मंदिर नहीं देखता वह अपने भीतर कुछ बदलता हुआ अनुभव करता है। यह आनंदमय कोश का स्पर्श माना गया। 

काशी के अतिरिक्त अन्य पंचकोशी / परिक्रमा परंपराएँ 

भारत में अनेक तीर्थों में “पंचकोशी” या परिक्रमा की परंपराएँ मिलती हैं। 

प्रयागराज पंचकोशी परिक्रमा 

संगम क्षेत्र की यह प्राचीन परिक्रमा अनेक तीर्थों, आश्रमों और वेदियों को जोड़ती है और माघ परंपरा से भी जुड़ी रही है। 

उज्जैन पंचक्रोशी यात्रा 

उज्जैन में भी पंचक्रोशी यात्रा का महत्व है, जहाँ महाकाल क्षेत्र के सिद्ध मंदिरों की परिक्रमा की जाती है।  

ब्रज 84-कोस परिक्रमा 

ब्रज की परिक्रमा श्रीकृष्ण लीला-भूमि के दर्शन और प्रेम-भक्ति की साधना मानी जाती है। 

गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा 

गोवर्धन की परिक्रमा अहंकार त्याग और शरणागति का प्रतीक मानी जाती है। 

नर्मदा परिक्रमा 

नर्मदा नदी  की दीर्घ परिक्रमा भारत की सबसे कठिन और तपस्वी यात्राओं में गिनी जाती है, जहाँ नदी को माँ और गुरु दोनों माना जाता है। 

पुरुषोत्तम मास और यात्रा का गूढ़ अर्थ 

पुरुषोत्तम मास में की गई यात्रा केवल पुण्य अर्जन नहीं यह स्वयं से मिलने का अवसर है। काशी की परंपरा मानो कहती है –पंचकोशी चलो ताकि पंचकोश जागें। पैर बाहर चलते हैं पर वास्तविक यात्रा भीतर होती है। और शायद इसी कारण काशी को केवल तीर्थ नहीं मोक्ष की चलती हुई साधना कहा गया है। 

To be continued . . .

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Published inpurushottam maas

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