A four-panel collage depicting elements related to the Kamakhya Temple and the goddess Kamakhya. The top-left shows an ancient, red-painted stone sculpture of a squatting figure. The top-right is an aerial view of the Kamakhya Temple complex with its distinctive red domes. The bottom-left features a close-up of the natural rock formation resembling a yoni, which is the temple's main object of worship. The bottom-right is an illustration of a fierce multi-armed Hindu goddess, possibly Kali or Kamakhya, with a fiery halo and weapons.

माँ कामाख्या :अंबुबाची महायोग

मंदिर के द्वार बंद, पुजारी भी नहीं अंदर,
रहस्य कुंड से निकलता है सिंदूरी जल,
रक्त वस्त्र प्रसाद, चमत्कारी है वो वस्त्र,
धारण करने से मिटते सारे रोग और कल।

माँ कामाख्या: अंबुबाची मेला

आइए अब  माँ कामाख्या :अंबुबाची महायोग  की इस रहस्यमयी, अलौकिक और आध्यात्मिक कथा को और भी अधिक रोचक, प्रभावशाली और रोमांचकारी अंदाज़ में महसूस करते हैं — जैसे मानो आप स्वयं नीलांचल पर्वत पर खड़े हों और ब्रह्मपुत्र की लहरों से माँ कामाख्या की ऊर्जा महसूस कर रहे हों।(Part 3)

असम के गुवाहाटी में सनातन का सबसे रहस्यमयी मेला “अंबुबाची मेला” लगता है। अंबूबाची महायोग अभी-अभी (22 से 26 जून 2025 ) को समाप्त हुआ है। इसमें देश के कोने कोने से बड़ी संख्या में तांत्रिक साधक, कापालिक, अघोरी  शक्ति साधक और नागा साधु ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे नीलांचल पर्वत के आसपास जुटे हुए थे ।

यहाँ नीलांचल पर्वत पर स्वयंभू गुफा में माँ कामाख्या का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण शक्ति पीठ और ये 72 घंटे उनकी तंत्र साधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं । इन 72 घंटों का एक भी पल बेकार न जाने पाए। इसके लिए वह बहुत सावधान रहते है । क्योंकि  इन 72 घंटों की साधना में उन्हें अलौकिक शक्तियां को प्राप्त कर  लेने का भरोसा होता है। जिन्हें कई साल की साधना के बाद भी हासिल करना संभव नहीं हो पाता है ।

 आम मंदिरों में श्रद्धालुओं का सैलाब तब बढ़ता है जब मंदिर का गर्भगृह दर्शन के लिए  खुलता है। लेकिन कामाख्या एक  अकेला ऐसा शक्तिपीठ है जहाँ जब मंदिर के गर्भगृह के दरवाजे बंद रहते हैं, तब वहाँ सबसे बड़ा भक्तों का श्रद्धालुओं का जुटान होता है। सबसे रहस्यमयी जुटान, सबसे बड़ा जुटान । सबसे सघन साधना होती है। यह माँ कामाख्या :अम्बूवाची महायोग का समय होता है। जब माँ कामाख्या के एकांतवास में जाने की मान्यता है ।

इस साल 22 जून 2025 से 26 जून 2025 तक यह माँ कामाख्या :अंबुबाची महायोग था । इस दौरान कामाख्या मंदिर के सारे दरवाजे बंद थे । अंदर कोई भी नहीं होता, कोई पुजारी भी नहीं । यही वो खास समय है जब कामाख्या के रहस्य कुंड से लगातार निकलने वाला पानी लाल हो जाता है । खून की तरह सिंदूरी रंग वाला। इसे माँ कामाख्या की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। जो कामाख्या मंदिर के रहस्य कुंड के लगातार बहने वाले जल में अम्बूवाची महायोग के दौरान 72 घंटों के लिए मौजूद रहता है ।

ये जो समय है बहुत दुर्लभ समय है। सौर जगत में ये सबसे महत्वपूर्ण समय है। जिस समय  सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है और आर्द्रा नक्षत्र का पहला चरण शुरू होता है। तब आर्द्रा नक्षत्र के इस पहले चरण के बाद जो समय होता है वो मुख्यतः आंतरिक ऊर्जा को साधने का समय होता है ।  ये जो साधना होती हैं ये पूर्णतः आंतरिक होती है।इस समय बाहरी कोई साधना नहीं होती है। इस समय अंदर से माँ के समक्ष अपने आप को समर्पित करना होता है । जो साधक ऐसा करने में सफल हो जाता है माँ का उसे आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है ।

सनातन के महत्वपूर्ण धर्म ग्रंथ देवी पुराण के मुताबिक “माँ कामाख्या :अंबुबाची महायोग” वही समय है जब माँ आदिशक्ति सृष्टि निर्माण का संकल्प लेती है और रजस्वला होती है । इसे आप मासिक चक्र के उस क्रम से भी समझ सकते हैं जो एक महिला में माँ बनने की क्षमता के आने का इशारा करते  है । यह स्त्रियों के सामान्य जीवन का हिस्सा होता है। जिससे उन्हें हर महीने गुजरना होता है। यही प्रकिया माँ कामाख्या का अंबुबाची महायोग के दौरान साल में एक बार होता है । अंबुबाची मेले के दौरान कामाख्या मंदिर इसलिए तीन दिनों के लिए बंद रहता है।

तब इन तीन दिनों के दौरान कुछ पाबंदियों का भी पालन करना होता है। जैसे मंदिर परिसर में प्रसाद नहीं बनेगा। मंदिर के अंदर पूजा नहीं होगी। उन्हें ऊंचे स्वर में बोल कर मंत्र पाठ नहीं सुनाया जाएगा। ऊंचे स्वर में उनकी स्तुति नहीं होगी । शुद्धता और साफ सफाई का खास तौर से ख्याल रखा जाए।

ये वही नियम हैं जिनका पालन मासिक धर्म के दौरान भी महिलाएं करती आ रही है । धार्मिक मान्यता है कि जब माँ आदिशक्ति ब्रह्मांड का निर्माण करती है श्रृष्टि के निर्माण का संकल्प लेती है तो उसके लिए वो अपनी 10 महाविद्याओं का प्रयोग करती हैं । अम्बूवाची महायोग उन 10 महाविद्याओं से खास तौर से जुड़ता है । इन दस महा विद्याओं के बारे में थोड़ा जिक्र करते हैं ।

   ये महाविद्या ,जो विग्रह रूप में नहीं है। जो यहाँ योनिमुद्रा में है। उन 10 महाविद्याओं के बारे में भी थोड़ा जानते हैं।

सनातन धर्म के ग्रंथों में 10 महाविद्याओं का वर्णन है ।ये 10 महाविद्याएं माँ आदिशक्ति के ही अलग अलग स्वरूप है। उनकी शक्तियां हैं और इन्हीं के जरिए पूरे ब्रह्मांड का संचालन होता है। ये 10 महाविद्याएं है काली, तारा, त्रिपुरा सुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला।

महाभागवत (देवी पुराण)

76 वां अध्याय कामरूप तीर्थ (कामाख्या शक्तिपीठ)

वामे तारा भगवती दक्षिणे भुवनेश्वरी।

अग्रोऽस्तु घोणटेशीविद्या नैऋत्यां भैरवी स्वयं॥९।।

वायव्यां छिन्नमस्ता च पृष्ठतो बगलामुखी।

ऐशान्यां सुन्दरी विद्या चोद्धर्वमातङ्गनायिका॥१०।।

v याम्यां धूमावती विद्या महापीठस्य नारद।

अधस्ताद्रवणावस्त्रो भस्माचलमयः स्वयं॥११।।”

अम्बुवाची महायोग में इन्हीं  10 महाविद्याओं की साधना विशेष रूप से की जाती है । देवी की इन्हीं शक्तिओं को साधने के लिए अम्बुवाची में तांत्रिक, मांत्रिक, साधु, सन्यासी, नागा, भक्त, श्रद्धालु जुटते हैं ।

v इनमें जो साधक पूरी तरह काले कपड़े में नज़र आते हैं उन्हें कौल कहा जाता है । यानी माता काली के उपासक ।

v जो पूरी तरह लाल कपड़े में दिखते है उन्हें शाक्त कहा जाता है। यानी शक्ति के उपासक ।

v यहाँ कापालिक भी होते हैं। जिनके हाथों में कपाल यानी खोपड़ी होती है ।

v इसके साथ साथ नाथपंथी भी होते हैं। जिनके कानो में चाँदी या लकड़ी के बड़े- बड़े कुंडल होते हैं।

v इन साधकों में औघड़ और अघोरी भी होते हैं। जो अपने शरीर पर भस्म मले होते हैं।

v इनके साथ यहाँ नागा साधुओं की भी पर्याप्त मात्रा होती है ।

 अलग अलग परंपराओं से जुड़े ये सभी साधक अम्बुवाची महायोग के 72 घंटों के दौरान कामाख्या मंदिर से लेकर नीलांचल पर्वत के अलग हिस्सों में अपनी साधना में लीन रहते हैं ।ये सभी अपने गुरु के आदेश से यहाँ आते है या फिर किसी विशेष साधना का संकल्प लेकर यहाँ आते है । या फिर किसी ख़ास तांत्रिक प्रयोग की सफलता के लिए ये यहाँ अम्बुवाची महायोग के दौरान पहुंचते हैं ।

आख़िर क्यों “माँ कामाख्या :अम्बुवाची महायोग” को सिद्धियां हासिल करने का महायोग माना जाता है ?

इसका जवाब अम्बुवाची शब्द में ही छिपा हुआ है – “अंबु” का मतलब होता है पानी

और “वाची” का मतलब होता है वचन देने वाला । सनातनी मान्यता है कि अम्बुवाची महायोग के दौरान माँ कामाख्या जब विश्राम की मुद्रा में होती हैं पूजा ग्रहण नहीं कर रही होती हैं। तब कामाख्या मंदिर के रहस्य कुंड का जल जहाँ माँ योनि मुद्रा में विराजमान हैं। उस जल में अपनी शक्तियों को प्रवाहित करती हैं। और इस दौरान साधकों को मनोकामना पूर्ण करने का वचन देती हैं ।

चलिए…  अब अम्बुवाची का सबसे बड़ा रहस्य भी जान लेते हैं – अम्बुवाची महायोग के दौरान कामाख्या मंदिर के गर्भगृह में खासतौर से सूत के सफेद कपड़े बिछा दिए जाते हैं । उन 72 घंटों के दौरान गर्भगृह के रहस्य कुंड से सिंदूरी लाल रंग का जल निकलता रहता है। गर्भगृह की जमीन पर बिछाया गया सफेद कपड़ा उसे सोखता रहता है। माना जाता है कि  इसमें देवी की महामुद्रा से निकला रक्त मिला हुआ होता है। इस वस्त्र को अत्यधिक शुभ माना जाता है। इसे देवी का रक्त वस्त्र प्रसाद कहा जाता है। यह महाप्रसाद बहुत ही चमत्कारी होता है । अम्बुवाची महायोग खत्म होने के बाद भक्तों में यही कपड़ा प्रसाद के रूप में बांटा भी जाता है।

 यह वस्त्र कामाख्या मंदिर से ही प्राप्त किया जाता है । कहा जाता है कि इस वस्त्र को घर में रखने से घर वालो को जो भी बीमारी ,परेशानी होती है समाप्त हो जाती है ।

इस वस्त्र को घर में रखने से अखंड रूप से धन की वृद्धि होती है और सुख और समृद्धि आती है । इस वस्त्र से काले जादू, भूत प्रेत बाधा, मानसिक तनाव तथा संबंधों का तनाव खत्म हो जाता है। यहाँ आने से निः संतानों को संतान सुख की प्राप्ति होती है ।

 अम्बुवाची महायोग का एक रहस्य ब्रह्मपुत्र नदी के पानी में लालिमा का आना भी है। माना जाता है कि इस दौरान मंदिर के रहस्य कुंड का जल नीलांचल पहाड़ी के अंदर से ब्रह्मपुत्र नदी में पहुंचता है और इसी लाली को अम्बुवाची महायोग का संकेत माना जाता है। इस सिंदूरी जल का वैज्ञानिकों ने बहुत विश्लेषण किया है परंतु अभी तक कोई ठोस तर्क नहीं दे पाए है । आगे के लेख में हम इन तर्कों के बारे में जानेंगे कि आखिर वैज्ञानिकों द्वारा क्या तर्क दिया जाता है ? और कैसे हो जाता है विज्ञान नतमस्तक ….साथ ही जानेंगे कि ये दस महाविद्याएं कैसे और क्या काम करती हैं ?

कहानी जारी है …to be continued …

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